डायबिटीज के प्रकार[Type Of Diabetes]

Type-1 Diabetes-

Type-1 जब पैंनक्रियाज (अग्नाशय) कि बीटा कोशिकाओं की क्षति के कारण इंसुलिन  बनना बंद हो जाता है और शरीर में इंसुलिन का अभाव रहता है इस तरह उत्पन्न डायबिटीज को टाइप वन कहते हैं तब इंसुलिन के अभाव की पूर्ति के लिए बाहर से इंसुलिन लेना अनिवार्य होता है इस स्थिति को “इंसुलिन डिपेंडेंट डायबिटीज मैलाइट्स  “ रोग का पूरा नाम “डायबिटीज मैलाइट्स” है अथवा I.D.D.M. कहते हैं इसका अभिप्राय यह  है कि ऐसे रोगी को इलाज के लिए इंसुलिन पर निर्भर करना पड़ता है।

Type-2  Diabetes-

Type-2  इस प्रकार के शरीर में इंसुलिन तो उपस्थित रहती है पर कुछ  कारणों  से तंत्र कोशिकाओं पर उसका वांछित  प्रभाव नहीं होता इन रोगियों के इलाज के लिए इंसुलिन देने की जरूरत नहीं होती इससे “नॉन इंसुलिन डिपेंडेंट डायबिटीज मैलाइट्स”  N.I.D.D.M. अथवा टाइप टू कहते हैं या दो प्रकार की होती है इस स्थूल एन आई डी डी एम और अस्थूल एन आई डी डी एम|

स्थूल एन आई डी डी एम का कारण मोटापा जीवन में श्रम का अभाव तथा मानसिक तनाव होता है इस के इलाज के लिए अक्सर वजन घटाना और व्यायाम करना ही पर्याप्त रहता है वजन ठीक हो जाने पर तंत्र कोशिकाओं पर इंसुलिन का पुनः वांछित प्रभाव होने लगता है।

अस्थूल एन आई डी डी एम के रोगी मोटे नहीं होते बीटा कोशिकाओं में इंसुलिन बनाने की क्षमता रहती है इलाज के लिए मुंह से खाई जाने वाली कुछ  विशेष दवाओं का इस्तेमाल लाभ करता  है इनसे आवश्यक मात्रा में इंसुलिन बनने लगती है।

अलग-अलग प्रकार की डायबिटीज  में इलाज का सही ढंग विभिन्न होता है।

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व्यापकता-

यूरोपीय देशों में किए गए सर्वेक्षणों से ज्ञात हुआ है कि सामान्य लोगों में 1000 व्यक्तियों में से लगभग 13 में यह  रोक पाया जाता है इनमें से आधो  में पहले से ज्ञात होता है, शेष में जांच करने पर पता चलता है अज्ञात रोगियों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक होती है।

कुल रोगियों में से लगभग एक चौथाई टाइप वन और तीन चौथाई टाइप टू के होते हैं टाइप 2 के कुल रोगियों में 80 -90 % स्थूल प्रकार के होते हैं।

लक्षण-

टाइप-1 प्रायः  कम उम्र 40 से नीचे के लोगों में और किशोरावस्था में पाई जाती है इसकी शुरुआत सहसा हो सकती है लक्ष्य उग्र  होते हैं शरीर दुबला होने लगता है वजन कम होता जाता है प्यास, पेशाब और भूख अधिक लगती है कब्ज रहता है त्वचा रूखी रहती है प्रायः खुजली होती है संक्रमण इंफेक्शन होते रहते हैं जैसे फुंसी, फोड़े, मूत्र  के रोग महिलाओं व पुरूषों के भारी जननांगों की खुजली और संक्रमण होते हैं थकान और कमजोरी बराबर होती है हाथ पैरों में झनझनाहट, पीड़ा अन्य सामान्य अनुभूतियां “चींटी सी रंगने की अनुभूति” जैसे लक्षण होते हैं पिंडलियों में पीड़ा होती है नजर में गड़बड़ी होने लगती है।

टाइप टू प्रायः  40 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में पाई जाती है आमतौर पर अधिकांश में से कोई प्रकट लक्षण नहीं होते  किसी अन्य कारण (बीमा अथवा  नौकरी) के लिए डॉक्टरी जॉच से मूत्र की जॉच किए जाने पर अचानक ही डायबिटीज  होने का पता चलता है अधिकांश लोग मोटे हो जाते हैं खाना अपनी जरूरत से अधिक खाते हैं जीवन में तनाव पाया रहता है| |

गुर्दों में विकृतियां आ जाती हैं उनके काम करने में खलल पड़ता है रक्तचाप बढ़ने लगता है हृदय और मस्तिष्क की धमनियों में भी परिवर्तन होते हैं तब इन के लक्षण पैदा होते हैं हार्ट  की पीड़ा, धड़कना ,सांस फूलना और लकवा तथा धनी मे रक्त  जम जाना और मस्तिष्क में रक्त स्राव। टांगों में पीड़ा होती है वह ठंडे रहते हैं और अंततः ड्रैगन ग्रेग्रीन हो  सकता है।

टाइप-वन के रोगी में इलाज के अभाव में और किसी उग्र संक्रमण से प्रभावित होने पर जब शरीर में शक्ति के लिए ग्लूकोज़ इस्तेमाल नहीं होता तब शक्ति  के लिए चर्बी इस्तेमाल होने लगती है परिणाम स्वरुप रक्त में कीटोन प्रदार्थ और चर्बी के अम्ल  इकट्ठे होने लगते हैं जिससे स्थिति  विषम होने लगती है अंतता  रोगी अचेत  हो जाता है अगर तुरंत सही इलाज ना हो तो स्थिति घातक हो जाती है।

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निदान-

इस रोग का निदान करना कठिन होता है उक्त लक्षण  आभास कराते हैं मूत्र  और रक्त जॉच  निदान की पुष्टि करते हैं नेटपटल ,मस्तिष्क , हृदय और गुर्दो  में हुए परिवर्तनों का पता लगाने के लिए संबंधित जाँचे  जरूरी होती है ।

निराकरण-

इस संबंध में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिन में इस रोग  की संभावना पहले से विद्यमान हो उन्हें क्या करना चाहिए जिससे रोग  अभ्यर्थी विकसित ना होता रहे जिन लोगों के बाप दादाओं या अन्य पूर्वजों में या रोग  रहता हो उन्हें विशेष सावधानी बरतने की जरूरत रहती है|

अपनी उम्र के हिसाब से ज्यादा और तेजी से बढ़ने वाले बच्चों की माताओं में भी यह संभावना पाई जाती है।

जन्म के समय अधिक भार वाले (9 पौंड 4 औस से अधिक) बच्चों भी आगे चलकर डायबिटीज होने की संभावना हो जाती है।

डायबिटीज के जो लक्षण बताए गए हैं वे सभी एक साथ एक ही रोगी में नहीं पाए जाते टाइप टू डायबिटीज में एकाध  गौण लक्षण प्रायः होते हैं। त्वचा में यत्र-तत्र खुजली ,बार बार फोड़े फुंसी निकलना, चोट लगने पर जख्म भरने में अधिक विलंब ,जनन अंगों में खुजली ,कब्ज और खाल के रूखे रहने के लक्षण अगर रहे तो डायबिटीज की संभावना का ध्यान रखना चाहिए।

जिन लोगों को डायबिटीज की पहले से संभावना हो उनको शुरू में ही कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए वजन ना बढ़ने दें और लंबाई व शारीरिक बनावट के अनुसार वांछित भार से वजन कुछ कम ही रखें तो बेहतर होगा।

खाने में शक्कर, गुड़ ,मिठाइयां ,घी ,मक्खन ,वनस्पति घी का अधिक प्रयोग ना करें शाक भाजी फल ,अंकुरित अनाज, छिकले वाले दालों का प्रयोग निर्मित करना चाहिए।

शरीर को आलसी ना बनने दे |

उम्र के अनुसार व्यायाम नियमित करें रहन सहन और कामकाज के ढंग ऐसे बनाएं कि अनावश्यक तनाव पैदा ना हो। आक्रोश , कुढन  झझलाहट, ईष्या , मायूसी, असंतोष का कारण चिंता आदि को मन में ना पनपने दें समय समय पर मूत्र व रक्त परीक्षण कराते  रहे।

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*चिकित्सक के परामर्श के बिना उपरोक्त औषधियों का सेवन ना करें।

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