उपचार-

आम लोगों को डायबिटीज का नाम सुनते ही इंसुलिन के इंजेक्शनों की कल्पना करके मन में सिरहन होने लगती है अब इस रोग के इलाज के लिए मुंह से खाई जाने वाली कुछ दवाई भी  इस्तेमाल होने लगी हैं।

इंसुलिन और इन दवाइयों का प्रयोग किस रोगी  में कब और कैसे किया जाए इसका निर्णय चिकित्सक ही कर सकता है सामान्य रोगियों के उपचार के बारे में कुछ बातें ज्ञात है।

जैसे कि ऊपर बताया जा चुका है देश के अधिकांश लोग N.I.D.D.M. टाइप टू प्रकार के मोटे प्रौढ़ व्यक्ति होते हैं। उनके इलाज में सबसे पहली बात यह है कि वह अपना अतिरिक्त वजन घटाएं और नियमित रूप से उपयुक्त व्यायाम करें 30 साल से अधिक उम्र के डायबिटीज के रोगियों में से लगभग 33% इतने से ही ठीक हो जाते हैं उन्हें और कुछ करने कराने की आवश्यकता नहीं रहती।

वजन चेक कर लेना और नियमित रूप से व्यायाम करने पर भी अगर रक्त में ग्लूकोज की मात्रा सामान्य ना हो तब टाइप टू के ऐसे रोगियों को मुंह से ली जाने वाली दवा लेने की जरूरत पड़ती है टाइप टू अस्थूल रोगियों को भी यह दवाई लेनी पड़ सकती हैं।

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टाइप-1 के रोगियों में भी पहले उनका वजन समान स्तर पर लाना जरूरी है उन्हें समुचित व्यायाम भी करना चाहिए इसके बाद ही आवश्यकता के अनुसार इंसुलिन का प्रयोग किया जाना चाहिए जिन रोगियों का भार  सामान्य से कम होता है उन्हें वजन बढ़ाने के लिए उपयुक्त आहार और साथ में इंसुलिन लेना चाहिए।

इंसुलिन कई प्रकार की होती हैं रोगी की स्थिति के अनुसार यह  निर्णय चिकित्सक कहता है कि कौनसी इंसुलिन दिन में कितनी बार कितनी मात्रा में ली जाए।

मुंह से ली  जाने वाली दवाईयों और इंसुलिन की मात्रा का पहले से ही निश्चय करना मुमकिन नहीं होता हर रोगी के लिए इसका प्रयोग एक न्यून अनुमानित मात्रा में शुरू करके रक्त में ग्लूकोज के स्तर पर नजर रखी जाती है तदनुसार दवा की मात्रा घटाई बढ़ाई जाती है एक बार मात्रा  तय हो जाने के बाद भविष्य में हमेशा के लिए वही मात्रा उपयुक्त नहीं होगी कि रोगी  की स्थिति में परिवर्तन और दूसरे रोगी की उपस्थिति के देखते हुए इन की मात्रा में भी फेरबदल करना पड़ सकता है।

इंसुलिन इंजेक्शन के माध्यम से लेने से ही प्रभावकारी बनती है समानता यह  संभव नहीं हो पाता कि डायबिटीज के रोगी को रोज डॉक्टर ,नर्स या कंपाउंडर की इंसुलिन का इंजेक्शन लगाना  रोगी को स्वयं ही इंजेक्शन लेना सीख लेना चाहिए।

आहार व्यवस्था-

डायबिटीज के उपचार में समुचित आहार व्यवस्था का विशेष महत्व है प्रायः रोगी  सही बातें नहीं जानते |  कुछ लापरवाह रहते हैं तो कुछ अनावश्यक दुराग्रही परहेज करते हैं बहुतो  की धारणा बन जाती है कि जितना कम खायेगे  उतना ही ठीक होगा तब वे अपने शरीर को उपयुक्त आवश्यकता भर ही नहीं खाते | हम यहां इस बारे में कुछ सिद्धांतिक बातें बता रहे हैं।

यह बताया जा चुका है कि सबसे पहले अपना वजन अपनी उम्र और लंबाई के अनुसार सही स्तर पर लाए ज्यादा हो तो कम करें कम हो तो बढ़ाएं तदनुसार ही भोजन व्यवस्था बनानी होगी।वजन ठीक हो जाने के बाद फिर रोजाना उतने कैलोरी मूल्य का आहार ले |  जो रोगी की अव्यवस्था जीवन स्थिति और कार्य के अनुसार उसकी ऊर्जा आवश्यकता की पूर्ति कर सके अन्य दृष्टियों  में भी भोजन संतुलित होना चाहिए।

खाने में प्रोटीन की तादाद 1 ग्राम प्रति किलोग्राम शरीर भार के अनुसार होनी चाहिए इसमें एक तिहाई उत्तम प्रकार की प्रोटीन ,दूध ,दही, पनीर, अंडा, मांस मछली से प्राप्त करनी चाहिए शेष वनस्पतिक खाद्य पदार्थों से।कुल ऊर्जा अवश्यकता  का 40-50% कार्बोज पदार्थों से प्राप्त करें वनस्पति आहार पदार्थों के जटिल कार्बोज चावल, आलू आने अन्य तरकारिया  लेने में कोई आपत्तियां नहीं है पर इनका कैलोरी मूल्य  वांछित ऊर्जा  की सीमा के भीतर ही रखना होगा शक्कर , शहद, गुड़ और उन से बने पदार्थों का परहेज करें पर जब सारी स्थिति उपयुक्त नियंत्रण में हो तो यदा कदा एक आधा  मिठाई का अपवाद कोई आफत नहीं बनता।

शेष ऊर्जा पदार्थों से पूरी करें वनस्पति तेलों का प्रयोग करना बेहतर होगा ऐसा करने से एथीरोस्कलीरोसिसा का विकास कम होगा।कोई अच्छा मल्टीविटामिन मिनरल सप्लीमेंट प्रतिदिन  ले।

दिन भर का कुछ आहार चार-पांच बार में सम  मात्रा में लें अपने भोजन और दवा का समय नियमित रख्खे | छोटी मोटी बीमारियों में खाना ना छोड़े अगर कभी भोजन ना ले सके तो दवा की मात्रा में संशोधन करना होगा वह उपवास भी ना करें सोशल ईटिंग से बचाव करें वंचित व्यायाम प्रतिदिन नियम से करें।

इन सिद्धांतों के आधार पर विस्तृत निर्देश अपने चिकित्सक से लें। अगर किसी डायटीशियन का परामर्श उपलब्ध हो सके तो बेहतर होगारोजाना का संयमित भोजन उबाऊ ना बने इसके लिए वैकल्पिक खाद्य पदार्थों की संतुलित मात्रा  का प्रयोग करें।

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हाईपरग्लाईसीमिया-

कभी-कभी लापरवाही से दवा वांछित से अधिक ले लिए जाने पर अथवा सही समय पर खाना ना खाने से रक्त में ग्लूकोज की मात्रा अत्यधिक घट जाती है। तब हाईपरग्लाईसीमिया की स्थिति पैदा हो जाती है इसके लिए सहरसा और तेजी से पैदा होते हैं रोगी को घबराहट होती है कमजोरी लगती है पसीना छूटने लगता है कपकपी होती है स्थिति उग्र हो जाने पर दौरे पड़ते हैं रोगी अचेत  हो जाता है मृत्यु भी हो सकती है।

हाईपरग्लाईसीमिया के प्रारंभिक लक्षण बनते ही रोगी का एहसास हो जाना चाहिए कि क्या हो रहा है तब तुरंत ग्लूकोज , चीनी के चार-चार चम्मच आधा गिलास पानी में घोल कर पी लेना चाहिए आधा अगर पानी उपलब्ध ना ग्लूकोज या चीनी वैसे ही फाक ले |  ऐसे रोगियों को एक छोटा पैकेज ग्लूकोज को सदा अपने पास रखना चाहिए।

सावधानियां-

रोगी को अपने पैरों के उंगलियों का विशेष ध्यान रखना चाहिए जूते मुलायम चमड़े के ऐसे बनवाएं जिनमें पंजा अपनी स्वाभाविक स्थिति में रह सकें उंगलियां दबे  नहीं नहाते समय उंगलियों के बीच के स्थलों को अच्छे साबुन और गुनगुने पानी से भली प्रकार साफ़ करे |फिर सूखा दे नमी ना रहने पाए  तौलिये से जोर से ना रगड़े  त्वचा को मुलायम रखने के लिए हल्का सा नारियल का तेल लगा दे हफ्ते में एक बार स्प्रिट  लगाए नाखून के कोने काट ले  लगाकर छोटे करना बेहद होता है नीचे के मुलायम तंतु एक ऐसा ना करें। नाखून  के कोने काट या खोद कर न निकाले अगर कहीं कोई घट्टा  हो तो उसे खुद ही निकलने का प्रयास ना करें मोज़े  कुछ ढीले  पहले|

डायबिटीज के रोगी को ध्रुमपान बिल्कुल नहीं करना चाहिए। शराब का सेवन भी हानिकर होता है।अगर कभी कहीं कोई चोट  ,कांटा ,बगैर लग जाए तो उपेक्षा ना करें जब कभी कहीं कोई दूसरी बीमारी उग्र  आदि हो तो अविलंब चिकित्सा से संपर्क करें।दावतों ,पार्टियों, कॉकटेल अधिक का लोभ और व्रत उपवास का आगरा आग्रह छोड  देना चाहिए महिला रोगी  जब गर्भधारण करें तो उसके बराबर कुशल  चिकित्सक की देखरेख में रखना चाहिए |

*चिकित्सक के परामर्श के बिना उपरोक्त औषधियों का सेवन ना करें।

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